Saturday, September 3, 2016

सात साल... सात जन्म... सात रंग इन्द्रधनुष के...!



ठीक ठीक याद नहीं अब सिवा इसके की ऐसे ही किसी मौसम में तुमसे पहली बार मिली थी... एक लंबा अर्सा गुज़र गया यूँ साथ चलते... आज सोचो तो लगता ही नहीं कि हम कभी अलग भी थे... इतने सालों में जाने कितने लम्हें बिताये तुम्हारे साथ... हर रंग में रंगे... सुर्ख भी... सब्ज़ भी... चमकीले भी... स्याह भी... कभी चटख गुलाबी तो कभी झील से नीले... हर लम्हें हर रंग का अपना मज़ा... पर वो पहला लम्हा वो पहला पल क्या कभी बुलाया जा सकता है... कोहिनूर सा चमकीला... सबसे अलग... कुछ अलग ही स्पार्क था उसमें... अलौकिक सा... रूहानी... जैसे उस एक लम्हे को वाकई उस ऊपर वाले ने ख़ुद ही रचा था हमारे लिये... रूहानी ही तो था हमारा मिलना.. है न ?

उस एक पल से ले कर आज तक हर लम्हा ये सफ़र ये हमारा साथ एक अलग ही एक्सपीरियंस रहा है.. कितना कुछ जिया हमने... हर वो ख़्वाब जो बिना हमारे मिले ख़्वाब ही रहता... वो सारी बचकानी ख़्वाहिशें जिन्हें तुमने पूरा किया... कितना कुछ तो लिख चुकी हूँ अपनी उन सारी ख़्वाहिशों के बारे में... साथ बिताये उन सारे पलों के बारे में... अब और क्या नया लिखूँ...

आज सोच रही हूँ... तुम्हारे साथ बिताये उन सारे चमकीले लम्हों को इक्कट्ठा कर के गर एक कलाइडोस्कोप बनाया जाये तो दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत रंग उनमें देखे जा सकेंगें... हर बदलते एंगल के साथ एक नयी पेंटिंग उभरेगी... बेहद ख़ूबसूरत... हमारे प्यार के रंगों में रंगी...

हमारे साथ का ये हर लम्हा तुम्हें भी मुबारक़ हो जान... तुम्हारी बहुत याद आ रही है आज.. बहुत मिस कर रही हूँ तुम्हें... बहुत ज़्यादा... बोलो न आज रात मिलोगे क्या... सपने में ?

ज़मीं पे न सही तो आसमां में आ मिल.. तेरे बिना गुज़ारा ऐ दिल है मुश्किल...!!!




*Paintings - Leonid Afremov

Thursday, August 18, 2016

चाय में चीनी सी ज़िन्दगी में घुली तुम्हारी नज्में...!



सुनो... एक कप चाय पियोगे हमारे साथ.. दो पल साथ बैठो ना... कि बड़े अर्से बाद आज थोड़ी फ़ुर्सत हाथ लगी है वो भी रात के इस पहर... और आज तुम्हारा जन्मदिन भी है तो तुमसे यूँ ही थोड़ी बातें करने का दिल चाह रहा है.. पिछले साल तो तुम्हारे जन्मदिन पर कुछ लिख भी नहीं पायी तुम्हारे लिये... हाँ याद सारे दिन किया... सुनने में कितना अजीब सा लगता है ना.. कि लेखक ठहरे तुम और हम जैसे कोई बड़े फन्ने खां हैं जो तुम्हारे बारे में लिखेंगे... फिर भी जाने क्यूँ लोग तुम्हें ढूँढते हुए हमारे दरवाज़े आ जाते हैं... सही कहते हैं लोग इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छिपते... तुमसे हमारा इश्क भी मशहूर हो चला है...

मोटर गैराज में रंगों के शेड्स मिलाते मिलाते जाने कब तुम ज़िन्दगी के अलग अलग रंगों से यूँ खेलने लगे... उनकी बारीकियों को ऐसे जान लिया... तुमने लिखना तो बहुत देर से शुरू किया पर शायद ज़िन्दगी के तजुर्बों को बचपन से ही आत्मसात करते गए थे... वो सब तजुर्बे जो तुमने अपने दिल में संजो रखे थे वो सब तुम्हारी नज़्मों में घुले हुए नज़र आते... तुम्हारी नज़्मों से गुज़रो तो समझ आता है कि वो ज़िन्दगी के इतने करीब कैसे हैं... बिना उन लम्हों को जिये कोई यूँ ही नहीं लिख सकता इस साफ़गोई से और दिल को यूँ छू लेने वाला और कभी कभी झकझोर देने वाला... सोचने पे मजबूर कर देने वाला... कुछ मायनों में तुम्हारी नज़्में हम सब का एक्सटेंशन हैं... हमारे लम्हों और हमारी ज़िन्दगी का एक्सटेंशन...

तुम्हारी नज़्में ज़िंदगी के हर लम्हें में घुल गयी हैं... कोई ना कोई नज़्म हर मोड़ पर हाथ थामे मिल ही जाती है... ख़ुशियों में... उदासियों में... प्यार में... तकरार में... सुनहरी सुबहों में... संदली शामों में... बारिशों के पानी में बच्चों सी छप-छप करती कोई, निम्मी निम्मी ठण्ड में आंगन में धूप सेकती कोई... चाँदनी रातों में बादलों का पश्मीना ओढ़े कोई... और तुम्हारी इन नज्मों से सिर्फ़ हम ही मुतास्सिर नहीं हैं.. यकीन नहीं तो ख़ुद देख लो.. जितने अच्छे से तुमने ये समझाया है कि नज़्म क्या होती है उतनी ही ख़ूबसूरती से ये विडियो बनाया गया है... जिसे चार मराठी डायरेक्टर्स ने अपनी फिल्म बाईस्कोप की ओपनिंग में इस्तेमाल किया था, ये फिल्म भी चार शायरों की नज्मों पर बनायी चार शॉर्ट फिल्मों के फॉर्मेट में एक अनूठा प्रयोग थी... तुमसे मुत्तासिर लोग भी तुम जैसे ही हो जाते हैं... अनकन्वेंशनल और सेंसिटिव !!!

video


आज का दिन तुम्हें और तुम्हारे चाहने वालों को बहुत बहुत मुबारक़ हो.. हैप्पी बर्थडे गुलज़ार साब... आज तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हारे चाहने वालों के लिए तुम्हारी पचास कहानियाँ छोड़े जाती हूँ...


Monday, July 4, 2016

आम के शहर से ख़ास मुलाक़ात !



बरसात का मौसम था और बादल सुबह से ही आँख मिचौली खेल रहे थे... कुछ कुछ हमारी तबीयत ही की तरह... हिम्मत नहीं पड़ रही थी जाने की पर सबका प्रोग्राम हमारी वजह से कैंसिल होता ये सोच के चल दिए हिम्मत कर के... नॉर्थ इंडिया की मैंगो कैपिटल घूमने... मलिहाबाद... लखनऊ से तकरीबन 25 किलोमीटर दूर... यूँ तो पहले भी कई बार जाना हुआ पर आम के मौसम में ख़ास उनसे ही मुलाक़ात करने जाने का ये पहला मौका था... शहर की घनी आबादी से निकल कर जैसे जैसे काकोरी मलिहाबाद की ओर बढ़ रहे थे हवा में आम की मादक गंध घुलती जा रही थी... सड़क के दोनों ओर आम के घने बग़ीचे और सामने घने काले बादल... तबियत अब कुछ कुछ सँभलने लगी थी...

पद्मश्री हाजी कलीम उल्लाह ख़ान साहब की अब्दुल्ला नर्सरी पहुँचे तो समझ आया की भला किसी को आम उगाने भर के लिए पद्मश्री से क्यों नवाज़ा गया... हाजी साहब से तो भेंट नहीं हो पायी पर उनके बेटे और पोते से मिले... आम से ही मीठे लोग... इतने प्यार से पूरा बाग़ घुमाया... एक एक आम (ख़ास) से मिलवाया... किस आम की क्या ख़ासियत... किस का नाम कैसे पड़ा... कौन सा आम कब होता है... कौन ज़्यादा मीठा कौन कम मीठा... कौन देखने में सुन्दर कौन खाने में बढ़िया...

आम का वो ऐतिहासिक पेड़ जिस पर हाजी साहब ने ३०० से ज़्यादा किस्म के आम उगाये

 सचिन
उस पेड़ से भी मिलवाया जिसके लिये हाजी साहब को पद्मश्री से नवाज़ा गया... पेड़ क्या था मानो अपने आप में पूरा का पूरा बग़ीचा था... एक समूची विरासत... एक भरा पूरा कुनबा... 300 से भी ज़्यादा तरह के आम एक ही पेड़ पर... सचमुच अजूबा था... यूँ तो गाँव में हमारा भी आम का बाग़ था पर ऐसा कुछ पहले कभी नहीं देखा था... एक ही पेड़ पर सचिन से भी मिले और अखिलेश से भी... मोदी से भी और अनारकली से भी... दशहरी से भी और अल्फान्ज़ो से भी... क्या हुआ सोच में पड़ गए ? अजी ये सब आम की उन अलग अलग नस्लों के नाम हैं जो उस एक  पेड़ पर थे...


कटहल आम



आपसे कोई कहे की आम के पेड़ पर कटहल और शरीफा देखा तो क्या आप यकीन करेंगें ? नहीं ना... पर यकीन मानिये हमने देखा... आइये आपको भी मिलवाते हैं... ये जनाब हैं कटहल आम... इनका ये नाम इनके वज़न की वजह से पड़ा... तक़रीबन डेढ़ से तीन किलो का ये आम एक पतली सी डंठल के सहारे कैसे टिका रहता है इतने ऊँचे पेड़ पर ये तो वो ऊपर वाला ही जाने या जाने हाजी साहब...

शरीफा आम





और इनसे मिलिये ये जनाब है शरीफा आम... देखने में शरीफा और खाने में आम... शरीफा और आम की क्रॉस ब्रीडिंग से बना एक अजूबा... हालांकि स्वाद में बहुत अच्छा नहीं होता पर दिखने में बिलकुल अनोखा...






टॉमी ऐटकिंस




आगे चले तो मिलना हुआ टॉमी ऐटकिंस साहब से... देखने में सुर्ख़ लाल... पहली नज़र में आँखों का धोखा मालूम देता है... पर पास जा के देखा छुआ तो यकीन आया की जनाब सचमुच में आम ही है... स्वाद इनका भी बहुत अच्छा नहीं होता पर देखने में बेहद ख़ूबसूरत... यूँ लगता था मनो आम ने सेब के कपड़े पहन लिए हों... इस आम की ख़ासियत थी इनकी लॉन्ग शेल्फ़ लाइफ़... मतलब तोड़ने के बाद भी काफ़ी दिन तक ख़राब नहीं होते हैं ये...


अल्फान्ज़ो


हाँ महाराष्ट्र के मशहूर आम हापूस यानि अल्फान्ज़ो से भी मिले... देखा जाए तो पूरी दुनिया में आम के नाम से लोग अल्फान्ज़ो को ही जानते हैं... खाने में हल्का मीठा और देखने में ख़ूबसूरत... सब के सब तकरीबन एक ही कद काठी के मानो किसी साँचे में ढाले गए हों... पर हुज़ूर जिसने कभी दशहरी न चखा हो... जौहरी न खाया हो... चौसा से न मिला हो या लखनऊआ सफ़ेदा न चूसा हो उसे आम के बारे में मालूम ही क्या हो... यूँ ही कल बातों बातों में हाजी साहब के बेटे अज़ीम साहब से ज़िक्र छिड़ा की स्वाद में दशहरी अल्फान्ज़ो से कहीं ज़्यादा अच्छी होती है पर मशहूर अल्फान्ज़ो ज़्यादा है इसकी कोई ख़ास वजह तो उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र सरकार ने अल्फान्ज़ो की मार्केटिंग काफ़ी अच्छे से करी है... उस पर बहुत पहले से सब्सिडी दी शायद यही वजह है की सारी दुनिया के लोगों तक वो ज़्यादा पहुँचा... पर अब जबकि यहाँ की सरकार भी दिलचस्पी ले रही है तो उम्मीद है जल्द ही दशहरी भी लोगों को आसानी से मुहैय्या होने लगेगी... 


आगे चले तो आम के बगीचे में पाइनएप्पल से भी मिले और नाशपाती, अमरुद और पपीते से भी... बाकी सब फल तो पेड़ों पर लगे हुए पहले भी देखे हैं पर पाइनएप्पल से यूँ मिलना पहली बार हुआ... हाजी साहब के बाग़ीचे में अर्से बाद आम के पेड़ों की डालियों पे चुहल करता बचपन फ़िर से मिला... जाने क्या क्या तो याद हो आया... पर उस बारे में फिर कभी बात करेंगे... क्योंकि बात निकलेगी तो फ़िर दूर तलक जायेगी... :)


आम के बग़ीचे में गए और आम का लुत्फ़ न लिया ये भी भला होता है कभी... कितने आम तो वहाँ से बीन के लाये... कितने वहाँ बैठ के खाये.. बचपन का हमारा फेवरेट आम सुर्खा मटियारा भी चखने को मिला वहाँ एक अर्से बाद... कभी आइये हमारे शहर तो मिलवायें आपको भी इस सब से...

वहाँ से निकले तो पास ही एक गौशाला देखने गए... आम के बाग़ों के बीच एक बेहद सुन्दर हनुमान जी का मंदिर... पास में ही एक तालाब था जिसके किनारे बतख मोर ख़रगोश जाने क्या क्या पला था... गायें तो खैर थीं ही... गौशाला के ही प्रांगण में कल आम की दावत थी... सब अपनी अपनी बाग़ का स्पेशल आम ले कर आये थे साथ ही आम का पना भी था... तो एक बार फिर आम की दावत कर के वहाँ से निकले...





 
मलिहाबाद की बात हो और जोश मलिहाबादी का ज़िक्र न आये ऐसा भला कहाँ मुमकिन है... मलिहाबाद को अलविदा करते हुए उनका वो मशहूर कलाम ज़हन में गूंजता रहा... "ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा...!



Monday, February 15, 2016

इश्क़ मुबारक़ !!!



पिछले एक हफ़्ते से हर जगह इश्क़ की ख़ुमारी छायी हुई है... फेसबुक पर... अख़बार में.. वाट्सऐप पर... न्यूज़ में... हर कहीं... जिधर देखो इश्क़ ही इश्क़... जैसे दुनिया में कोई बुराई बची ही ना हो... हर कोई किसी ना किसी के प्यार में है या होने के लिये बेताब है... प्रॉमिस डे प्रपोज़ डे से लेकर हग डे किस डे तक... सही मायनों में इश्क़ का बाज़ारीकरण... ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स ने जम कर डिस्काउंट्स दिये प्यार के नाम पर तो होटेल्स और रेस्टोरेंट्स ने कपल्स के लिये स्पेशल ऑफर्स...

ख़ैर इस सब के बीच आज यूँ ही बैठी सोच रही थी कि क्या ज़रूरी है कि ये इश्क़ किसी इंसान से ही हो...कितनी तो चीज़ें हैं इस दुनिया में इश्क़ करने लायक... जैसे आपकी फेवरेट हॉबी... म्यूज़िक... पेन्टिंग... डांसिंग... ये सब भी तो आपका प्यार ही होते हैं... अपनी इन हॉबीज़ के लिये भी तो हम ठीक वैसे ही जुनूनी होते हैं जैसे किसी इंसान के लिये... हमने भी अपने इन सब इश्कों के साथ आज का पूरा दिन बिताया...

सुबह सबसे पहले तुम्हारे साथ राधा कृष्ण के मन्दिर गयी... कि प्यार की इनसे बड़ी कोई मिसाल है क्या दुनिया में... तो प्यार के इस दिन की इससे ख़ूबसूरत शुरुआत और क्या हो सकती थी... तुम चले गये तो थोड़ी देर फोटोग्राफी करी... देखो ना फूलों को भी जैसे पता था कि आज का दिन कुछ ख़ास है... जी भर के खिले थे.. हर रँग में मुस्कुराते हुए से... फिर अपना पसंदीदा नाश्ता बनाया गरमा गरम कॉफी के साथ... ढेर सारा म्यूज़िक सुना सारा दिन... अपना फेवरेट वाला पर्पल नेलपेंट लगाया... इश्क़ में डूबी एक कहानी पढ़ी... और इश्क़ से लबरेज़ एक मूवी देखी... फिर से... "लैटर्स टू जूलिएट"... देखी है क्या तुमने... प्यार के शहर वेरोना में फिल्माई बड़ी ही ख़ूबसूरत कहानी है... कैसे एक औरत 50 साल बाद अपने प्रेमी को ढूँढती है... जिस लकड़े को वो 15 साल की उम्र में छोड़ के चली गयी थी क्यूंकि उसमें समाज और अपने परिवार का विरोध करने कि हिम्मत नहीं थी... कैसे जूलिएट कि लिखी एक चिट्ठी उसे ये हौसला देती है उम्र के उस पड़ाव पे... और वो अपने पोते के साथ चली आती है अमेरिका से इटली... सिर्फ़ अपने प्यार को ढूँढने... पढ़ना चाहोगे उस चिट्ठी में क्या लिखा था ?

Dear Claire,

"What" and "If" are two words as non-threatening as words can be. But put them together side-by-side and they have the power to haunt you for the rest of your life: What if? What if? What if? I don't know how your story ended but if what you felt then was true love, then it's never too late. If it was true then, why wouldn't it be true now? You need only the courage to follow your heart. I don't know what a love like Juliet's feels like - love to leave loved ones for, love to cross oceans for but I'd like to believe if I ever were to feel it, that I will have the courage to seize it. And, Claire, if you didn't, I hope one day that you will.

All my love, Juliet

कौन ना पिघल जाये ऐसे ख़त से ऐ ख़ुदा... एक बात बताओ जान... तुमने इतने सालों में कभी हमें कोई चिट्ठी क्यूँ नहीं लिखी... लिखो ना प्लीज़... बस ऐसे ही... कुछ भी... पर लिखो... हाँ एक चीज़ और... इस बार तुमसे मिलेंगे ना तो एक शाम किसी पहाड़ी पर साथ में बैठ के डूबता हुआ सूरज देखेंगे... कितना ख़ूबसूरत लगता है ना वो... जब शाम का सिन्दूरी सोना आस्मां के गालों पे मल के उसकी आग़ोश में खो जाता है... तो इस बार हमारी एक सनसेट डेट पक्की ना ?

P.S. - सुबह सुबह तुमसे झगड़ी भी थी और ऐज़ यूज़ुअल हमारा ऑलमोस्ट ब्रेकअप भी हो ही गया था... पर तुम हो ना.. जानती हूँ लड़ोगे झगड़ोगे पर कहीं नहीं जाने दोगे हमें... और ना ही ख़ुद कभी कहीं जाओगे हमें छोड़ के... तो ये लड़ता झगड़ता प्यारा इश्क़ तुम्हें बहुत मुबारक़ मेरी जान... and do I need to say I Love You !!!



Monday, February 1, 2016

ये मिलती है, बिछड़ती है, बिछड़ के फिर से मिलती है...!



आज सुबह न्यूज़ पेपर पढ़ते हुए अनायास ही एक तस्वीर पर नज़र पड़ गयी... और तब से तुम बेइन्तहां याद आ रहे हो... अब तुम सोच रहे होगे कि ऐसी कौन सी तस्वीर देख ली हमने... याद है जान वो दौर जब हम सारा सारा दिन साथ रहा करते थे... सारा सारा दिन बातें करते... कभी साथ घूमते फिरते... कभी नाचते गाते... कभी साथ सफ़ाई करते... कभी साथ खाना बनाते... यूँ समझो वैसे ही एक पल की तस्वीर थी जब किचन में तुमने मुझे चुपके से जकड़ लिया था अपनी बाँहों में... और मज़ाक में कहा था अब कभी नहीं छोड़ूँगा तुम्हें और मैंने मन ही मन कहा था आमीन !

जाने क्यों आज सुबह से ही मन हो रहा है दूर कहीं हरी भरी वादियों के बीच जाने का... लंबी सी अंतहीन सड़क हो कोई... सुनसान सी... पर बेहद अपनी... सड़क के दोनों और हरे भरे खेत हों... उनकी मुंडेरों पर पीले जंगली फूल... गुनगुनी सी धुप और हवा में हरियाली की मादक गंध... पार्श्व में किसी बंजारन नदी का अनहद नाद... खुली हुई गाड़ी हो बिना छत की... तुम हो... मैं हूँ... बस... ऐसी कोई जगह जानते हो क्या जान ? ले चलो ना हमें वहाँ...

जानते हो इन शहरों का भी दिल धड़कता है... उनकी तासीर भी कुछ कुछ इंसानों जैसी ही होती है... उन्हें भी कभी कभी हम ठीक उसी तरह मिस करते हैं जैसे किसी इंसान को... तुम्हारे शहर से तो जैसे बरसों पुराना कोई रिश्ता है... यूँ साथ साथ ऊँगली थामे चलता है हर वक़्त गोया तुमने थाम रखा हो... जानते हो जान... तुम्हारे साथ साथ तुम्हारे इस शहर से भी मोहब्बत होती जा रही है... हर पल आवाज़ देता है ये... फिर फिर लौट आने को मजबूर करता हुआ...

कभी कभी ना बड़ा दिल करता है कि गुनगुनी धूप हो और मखमली घास पे तुम्हारी गोद में आँखें मीचे लेटी रहूँ और तुम मेरे बालों में हाथ फेरते हुए मेरी फेवरेट किताब पढ़ के मुझे सुनाते रहो... आह.. कितना प्यारा ख्याल है ना... काश कि कभी इसे हकीकत में बदल पाऊँ... यहाँ सिर्फ़ इसलिये दर्ज करा दिया है कि सनद रहे...

किसी के प्यार में होना जितना खूबसूरत एहसास है उतना ही अपने सामने प्यार को पनपते हुए देखना भी... लगता है जैसे एक्शन रिप्ले कर के हम अपनी ज़िंदगी ही दोबारा जी रहे हों... वो छेड़ना वो मनाना... वो घंटों घंटों बातें करना.. दुनिया से बेफिक्र.. एक दूसरे की छोटी छोटी बातों का ख़्याल रखना... एक दूसरे के बारे में हर छोटी बड़ी चीज़ जान लेने की उत्सुकता... कभी कभी सोचती हूँ आजकल के लड़के लड़कियों जैसे हम कभी डेट पर नहीं गए ना जान... कभी साथ में फ़िल्म नहीं देखी... कैंडल लाइट डिनर नहीं किया... कैसा एहसास होता होगा वो... सुनो ना ! किसी दिन डेट पे चलोगे मेरे साथ... ?


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