Monday, July 3, 2017

केरल डायरीज़ - ६ : फिरोज़ी इश्क़... कोवलम !




२ फरवरी २०१७

कोवलम... यानी नारियल के पेड़ों का उपवन... इससे बेहतर और उपयुक्त नाम हो ही नहीं सकता इस जगह का... दूर तक फैला नीला अरब महासागर और किनारे लगे असंख्य नारियल के पेड़... आने वाले दो दिनों में ये जगह हमारी ऑल टाइम फेवरेट लिस्ट में शामिल होने वाली है ये हमें भी नहीं पता था....

बीती रात लहरों के शोर ने समंदर से मिलने की उत्सुकता कुछ और बढ़ा दी... रात उठ उठ के जाने कितनी बार खिड़की से झाँका कि सुबह हो गयी क्या... पर सुबह को तो अपने तय समय पर ही होना था सो वो तभी हुई... हाँ हम जैसे तैसे तो ६ बजे तक पड़े रहे बिस्तर में फ़िर बस आ कर टंग गये बालकनी में और लहरों को साहिल संग अठखेलियाँ करते देखते रहे एक टक... कोवलम में तीन मेन बीच हैं... सबसे बड़ा और टूरिस्टों से हमेशा भरा रहने वाला कोवलम बीच, विदेशी सैलानियों के लिए प्रसिद्द हावा बीच और तीसरा समुद्र बीच जो अपने शान्त वातावरण के लिये प्रसिद्द है... हम जिस रिसोर्ट में रुके थे वो दरअसल यहीं समुद्र बीच के किनारे था... यहाँ बहुत कम ही लोग आते हैं... ज़्यादातर वो जो इस रिसोर्ट में या आसपास के होटलों में रुके होते हैं... तो एक तरह से ये बीच अनौपचारिक तौर पर इस रिसोर्ट के लिए प्राइवेट बीच का काम करता है...

समुद्र बीच से सामने पहाड़ी पर लाल और सफ़ेद रंग की जो बिल्डिंग दिख रही है
वो होटल लीला कोवलम है
किसी तरह ६.३० बजा और जैसे ही थोड़ी चहलपहल दिखी बीच पर हम भी निकल गए लहरों से मिलने... यूँ लहरों से भोर का राग सुनने का ये बिलकुल अलहदा तजुर्बा था... बेहद रूहानी... जाने कितनी देर किनारे बैठे लहरों को यूँ आते जाते देखते रहे... अजब सम्मोहन था उनकी चाल में... दूर से उठती कोई लहर ढेर सारा सफ़ेद दूधिया झाग अपने संग लिये आपकी ओर दौड़ती आती है और छपाक से गिरती है साहिल पे... कोई बस चुपके से दबे पाँव आती है और पैरों में गुदगुदी मचा में खिलखिलाती हुई वापस भाग जाती है... तो कोई दुष्ट लहर ढेर सारी रेत बहा ले जाती है आपके पैरों तले से और आपके पैर धंस जाते हैं साहिल की रेत में... जी करता कि बोलें उसे, रुको, अभी बताते हैं तुम्हें और दौड़ जायें दूर तक उस पागल लहर के पीछे... कितने तो मासूम खेल और कितने ही बचकाने ख़यालात... दिल सच में बच्चा हुआ जाता था वहाँ पहुँच के...

नाव में बैठ कर दूर समंदर में जाल डालने जाते मछुआरे

फ़ोटो बड़ा कर के देखने पर समंदर में दूर तक तिकोना आकार बनाते छोटे छोटे से सफ़ेद डिब्बे जैसे दिखेंगे
वो दरअसल मछुआरों के द्वारा डाले हुए जाल के दो सिरे हैं
 

जाल के एक सिरे पर रस्सी खींचते मछुआरे 
लहरों के संग खेलने और यहाँ की आधी काली आधी भूरी रेत में देर तलक चहलकदमी करने के बाद थोड़ा सुस्ताने बैठे तो देखा दूर समुद्र में जा के जो मछुआरों ने जाल डाला था अब उसे खींचना शुरू करने वाले थे... उन्हें जाल की रस्सी खींचते देखना भी अपने आप में एक अजब अनुभव था... पहली चीज़ जिसने आकर्षित किया वो था उनका सिंक्रोनाइजेशन... दोनों छोर पे तकरीबन २०-२० मछुआरे जाल की रस्सी खींच रहे थे और साथ में एक अजब ही आवाज़ निकल रहे थे... शायद एक दूसरे का उत्साह बढ़ने के लिये... ये मछली पकड़ने का पूरा साईकल तकरीबन ३ घंटे का होता है जो दरअसल सुबह करीब ६ - ६.३० शुरू होता है जब कुछ मछुआरे एक नाव में बैठ कर समुद्र में काफ़ी दूर तक जाते हैं और जाल को पानी में डालते हैं... फ़िर वापस किनारे पर आ कर अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर जाल के दोनों छोर में बंधी रस्सी खींचते हैं मछलियों से भरे जाल को वापस लाने के लिए... उस दिन कितनी मछलियाँ फँसी जाल में ये तो हमने नहीं देखा... अलबत्ता भीगे हुए, १५-२० मिनट तक मछुआरों का रस्सी खींचना देख कर ठण्ड ज़रूर लगने लगने लगी.. तो पास में ही एक चाय की दूकान पर जा कर चाय पी और साथ में गरम गरम मैगी खायी तब जाकर ज़रा जान में जान आयी :)

१० दिन की इस हेक्टिक ट्रिप के बीच कोवलम का ये दिन हमने रिलैक्स करने के लिए चुना था तो लगभग सारा दिन ही रिसोर्ट में आराम किया और आगे की यात्रा के लिए री-एनर्जाइज़ हुए... और उसके लिये ये रिसोर्ट बेस्ट था... यूँ तो कमरा भी शानदार था खुला खुला हवादार... पर अन्दर मन किसका लगता है... हमें तो रूम के बहार की बालकनी बहुत पसंद आयी... जी चाहे तो सारा दिन वहाँ बैठे समंदर को निहारिये... किताबें पढ़िये... सामने नारियल से लदे पेड़ों को देखिये... उस सब से थक जाइये तो स्विमिंग पूल का लुत्फ़ उठाइये या केरल की फेमस आयुर्वेदिक मसाज का...






सारा दिन रिलैक्स करने के बाद शाम को सोचा पद्मनाभ स्वामी मन्दिर देख आया जाये... देखें तो ज़रा आख़िर क्यूँ इसे दुनिया का सबसे अमीर मन्दिर कहा जाता है और भगवान आख़िर इतने सोने का करते क्या हैं... मन्दिर बेहद भव्य और ख़ास द्रविडियन वास्तुशैली में बना हुआ था... भव्य गोपुरम और विशाल प्रांगण... चारों ओर ऊँची दीवारों से घिरा... सामने एक तालाब... कैमरा और फ़ोन सब काफ़ी दूर ही जमा करा लिए गए थे तो कोई भी फ़ोटो लेना संभव नहीं हो पाया... पर मन्दिर ऐसा है की ख़ुद देख के ही अनुभव कर सकते हैं... कैमरा उसका अंश मात्र भी कवर नहीं कर सकता... सख्त पत्थरों में कैसे बोलती हुई मूर्तियाँ उकेरी गयी थीं पूरे प्रांगण में... कहीं दीवारों पर कहीं खंभों पर कहीं छत में... हर छोटी बड़ी मूर्ति लगता था बस अभी बोल पड़ेगी... जाने कौन शिल्पकार थे वो जिन्होंने पत्थरों में यूँ जान डाल दी थी... 

यूँ तो मन्दिर में दर्शन के लिए बहुत लंबी लाइन लगती है पर जब हम मन्दिर पहुँचे तो संध्या आरती का समय होने वाला था और पट बंद होने वाले थे आधे घंटे के लिये तो लाइन में लगे सभी लोगों को जल्दी जल्दी दर्शन कराये गये... मन्दिर में मुख्य मूर्ति भगवान विष्णु की है जो "अनंत शयनं" मुद्रा में शेष नाग पर लेटे हुए हैं... उनका दाहिना हाथ शिव लिंग के ऊपर रखा हुआ है... उनकी नाभि से स्वर्ण कमल निकल रहा है जिस पर ब्रह्मा विराजमान हैं... साथ ही श्रीदेवी लक्ष्मी, भूदेवी, भृगु मुनि और मारकंडेय मुनि की मूर्तियाँ भी हैं... कहते हैं विष्णु भगवान की मूर्ति १२००८ सालिग्रामों से बनी है... और ये सारे सालिग्राम नेपाल में बहने वाली गण्डकी नदी से लाये गए थे... मूर्ति इतनी विशाल है की उसे तीन दरवाज़ों से पूरा देखा जा सकता है... पहले दरवाज़े से भगवान का सिर और हाथ... दूसरे से नाभि से निकलता कमल और तीसरे से उनके चरण... सच पूछिये तो ऐसी विशाल और इतनी सुन्दर मूर्ति हमने आजतक नहीं देखी... कुछ क्षणों का ही सही पर ये एक अनूठा अनुभव था...

मन्दिर से वापस आये तब तक अँधेरा हो चूका था और एक बार फ़िर से सनसेट देखना मिस कर दिया था हमने... खैर खाना वाना खा कर आज जल्दी सोने की तैयारी करनी है... कल का दिन भी लंबा होने वाला है... आज केरल में हमारी आखरी रात है... कल कन्याकुमारी जाना है...



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Friday, June 2, 2017

केरल डायरीज़ - ५ : पानियों पे बहती ज़िन्दगी...



१ फरवरी २०१७

मुन्नार की ख़ुमारी अभी उतरी भी नहीं थी कि आज एक और सफ़र पर निकलना था... आज का दिन थोड़ा लंबा होने वाला था... कोच्ची से तकरीबन २२० किलोमीटर का सफ़र तय कर के आज हमें कोवलम पहुँचना था... इस ट्रिप पर मुन्नार के बाद अगर किसी डेस्टिनेशन के लिए हम बहुत ज़्यादा एक्साइटेड थे तो वो था कोवलम और अल्लेप्पी... अल्लेप्पी के बैक वाटर्स के बारे में बहुत कुछ सुन और देख रखा था टीवी और मैगज़ीन्स में... कोच्ची से ये अल्लेप्पी कोई ५५ किलोमीटर की दूरी पर है कोवलम जाने वाले रास्ते में ही... शेड्यूल बहुत टाइट होने की वजह से वहाँ रात रुकना तो मुमकिन नहीं था पर यहाँ तक आ कर अल्लेप्पी जाना तो था ही.. सो रास्ते में २ घंटे का हॉल्ट ले कर बैक वाटर्स का मज़ा लिया जाना तय हुआ... ये जानने-समझने के लिये की आख़िर क्यूँ अल्लेप्पी को "वेनिस ऑफ़ दा ईस्ट" कहते हैं... 

यूँ तो केरल में बैकवाटर्स का तकरीबन ९०० किलोमीटर लंबा नेटवर्क है जो लगभग केरल की आधी लम्बाई के बराबर है... ये बैकवाटर्स असंख्य झील, तालाब, नदी, नहर और खाड़ियों की परस्पर जुड़ी हुई एक लंबी चौड़ी पानी की भूल भुलैया जैसे हैं... जो दरअसल अरब महासागर की तेज़ लहरों द्वारा पैदा किये करंट की देन हैं... ये करंट साग़र की ओर बह कर आ रही नदियों और पानी के अन्य स्रोतों की राह में एक तरह का व्यवधान डालता है और उन्हें पीछे ज़मीन की ओर धकेलता है जिससे ये बैकवाटर्स बनते हैं... 

इन ख़ूबसूरत बैकवाटर्स को एक्स्प्लोर करने का एक ही तरीका है... किसी हाउस बोट में बैठ कर पानी के दोनों किनारों पर लगे असंख्य नारियल के पेड़ों को देखते हुए प्रकृति में बस खो जाइये और उस प्रकृति का हिस्सा हो जाइये... ऐसे ही एक हॉउस बोट पर बैठ कर हम भी कुछ देर उस ख़ूबसूरती का हिस्सा हो गये... केरल की जो छवि न जाने कब से मन में बसी हुई थी वो आज हमसे रु-ब-रु थी... मीलों तक पानी ही पानी... पानी के दोनों किनारों पर लगे नारियल के पेड़... जो झुक कर पानी को चूमते हुए से प्रतीत होते हैं... पानी पे तैरती हाउस बोट्स... मछली पकड़ते मछुआरे... नाव पर ढेर सारे नारियल इकठ्ठा करते नाविक... किनारों पर बने छोटे छोटे घर... तकरीबन हर घर में ही नारियल के अलावा आम, केला, कटहल और लाल लाल फूलों से लदे गुड़हल के पेड़... घरों के आगे बंधी नाव और पीछे धान के हरे भरे खेत... सब कुछ कितना सौम्य, कितना शांत...



पानी के साथ साथ समय भी मानो थम सा गया था यहाँ... कुछ था जो शहर की भाग दौड़ से परे समय को थामे हुए था यहाँ... पानी के किनारे बसे लोग इस जीवन के अभ्यस्त हो चुके थे... ये पानी उनकी लाइफलाइन था... कोई घर से निकल कर चार जीने उतर कर इसी पानी में कपड़े धो रहा था और कोई बर्तन... तो कोई बस पानी के किनारे बने लकड़ी के छज्जों में बैठा बातें कर रहा था... किनारे बसे कई घरों में छोटे छोटे ढाबे नुमा रेस्टोरेंट खुले थे, जहाँ घर की महिलायें ही खाना बना रही थीं और पुरुष खाना परोस रहे थे... यही इनकी आजीविका का साधन है... यहाँ टूरिस्ट्स ख़ास तौर पर विदेशी सैलानी बड़े चाव से केले के पत्तों पर परोसा हुआ खाना खाते हैं... इसके अलावा मछली पकड़ना और नारियल पानी बेचना भी इनके जीवन यापन का साधन है... ये लोग इतने में ही संतुष्ट रहते हैं... यहाँ की महिलायें बहुत मेहनती हैं... पुरुषों के साथ साथ महिलायें भी बहुत अच्छे से नाव चला रही थी... हालांकि उनके लिए ये रोज़ मर्रा का काम था क्यूंकि कहीं भी जाने के लिये उनके पास यही एक रास्ता था पानी का और यही एक साधन यानी की नाव... पर यूँ इतने अच्छे से तैयार हो कर, सुन्दर सी साड़ी पहने, बालों में गजरा लगाये, नाव खेती महिलायें पहली बार देखी थी हमने सो थोड़ा विस्मित थे और थोड़ा अभिभूत...





पानी पर यूँ तैरते बहते समय कैसे तेज़ी से बीता पता ही नहीं चला... २ बजने को आया था... अभी कोवलम तक का सफ़र बहुत लंबा था सो ज़्यादा देर नहीं करते हुए हमने आगे का सफ़र जारी रखा... कोवलम पहुँचते तक शाम हो चुकी थी... सनसेट देख पाने की उम्मीद ख़त्म हो चुकी थी... रिसोर्ट में चेक इन कर के रूम में पहुँचते तक बिलकुल अँधेरा हो गया था... अब कमरे की बालकनी में खड़े हो कर सिर्फ़ लहरों का शोर सुना जा सकता था... उन्हें देखने और उनसे खेलने के लिए सुबह तक का इतज़ार और सही...!


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Monday, May 15, 2017

केरल डायरीज़ - ४ : साहिर सुबह पहाड़ों की...



३१ जनवरी २०१७

आपने पहाड़ों की सुबह देखी है कभी ? पहाड़ों से ज़्यादा आलौकिक सुबह शायद ही कहीं होती हो धरती पर... जब रात की सियाही को भेदती भोर की सुनहरी किरणें पहाड़ की चोटी पर पड़ती हैं तो यूँ लगता है गोया धीरे धीरे किसी रंगमंच का पर्दा उठा रहा हो... पर्त दर पर्त कोहरा छनता जाता है... ओस की बूंदे खिड़की के शीशों पर पानी में तब्दील होते हुए अपने निशां छोड़ती जाती हैं... हौले हौले आपके सामने वो बड़ा सा रंगमंच जीवंत हो उठता है... सामने घट रहा दृश्य यूँ साफ़ होता जाता है गोया फेड इन ट्रांज़िशन पे सेट हो... पंछी चहकने लगते हैं... पेड़ हरे हो जाते हैं... दूर कहीं बहते पानी की कल कल बैकग्राउंड में संतूर सी बज उठती है... कहीं किसी पहाड़ी घर की रसोई जाग जाती है... चूल्हे से धुआं उठता है.. चाय की महक घुलती है... भोर की सुनहरी ठंडक क़तरा क़तरा आपकी रूह के भीतर कहीं जज़्ब हो जाती है... 

मुन्नार में ऐसी ही एक दिव्य सुबह से मुलाकात हुई... सुबह कोई ५.३० बजे आँख खुली और बस खिड़की के पास बैठे बैठे सहर के साहिर का जादू देखते देखते, उस सुनहरी ठंडक को भीतर जज़्ब करते करते कब एक घंटा बीत गया पता ही नहीं चला... दिल फ़िर भी नहीं भरा... मन हुआ बस सारा दिन यहीं इस खिड़की के पास बैठे रहें.. प्रक्रति की ख़ूबसूरती में खोये हुए... पर ये न थी हमारी क़िस्मत... सो उठाना पड़ा... नहा धो के तैयार हो कर नाश्ते के लिए बैंक्वेट में पहुँचे तो बड़ा भला सा लगा... चारों ओर काँच की खिड़कियों से छन के आती धूप ने फ़िर मोह लिया... खैर आज बहुत कुछ और नया देख कर वापस कोच्ची भी जाना था तो ज़्यादा फ़ुर्सत से नहीं बैठे.. जल्द ही नाश्ता कर के होटल से चेक-आउट किया और चल पड़े आज के सफ़र पर...

चाय के ख़ूबसूरत बागानों के बीच से होते हुए हम जा रहे थे १३ किलोमीटर दूर आज के पहले पड़ाव मत्तुपेट्टी डैम और झील देखने... मौसम बेहद ख़ुशगवार था... हवा में हल्की ठंडक.. इतनी हल्की की सुबह की धूप भली सी लग रही थी... चारों ओर इतनी हरियाली दिल को बेहद सुकून दे रही थी... हमारे शहरों में कहाँ अब इतनी हरियाली एक साथ देखने को मिलती है... दिल हो रहा था यहीं कहीं एक छोटी सी झोपड़ी बना के बस जायें... जैसे जैसे आगे बढ़ते गए चाय के बागान घने जंगल में तब्दील होते गये... सर्पीले मोड़ों पर गाड़ी दौड़ती जा रही थी... एक पहाड़ से दूसरे पहाड़... जंगल की गंध अपना सुरूर दिल-ओ-दिमाग पर काबिज़ करती जा रही थी... इस बीच पहाड़ों से घिरी हुई हरे रंग की एक झील नज़र आयी... मतलब हम मत्तुपेट्टी डैम पहुँच चुके थे और ये झील दरअसल उस डैम के पानी का रिज़रवॉयर थी... डैम तो कुछ ख़ास नहीं था पर झील ने मन मोह लिया... चारों ओर बेइन्तेहाँ ख़ूबसूरत पहाड़ियों से घिरी बेहद शान्त झील... सुबह के शान्त वातावरण में झील की शान्त ख़ूबसूरती घुल के एक अनोखा ऐम्बीअंस क्रिएट कर रही थी... ऐसे लग रहा था मानों पूरी प्रकृति मेडीटेट कर रही है... दिल हो रहा था बिना उस तारतम्य को बिगाड़े बस चुपचाप वहीँ बैठे रहें देर तलक... 






थोड़ी देर रुक कर आगे बढ़े इको पॉइंट की तरफ़ जो वहाँ से थोड़ी ही दूर है... इको पॉइंट की ज्योग्राफिकल लोकेशन ऐसी ही की उस जगह आवाज़ नेचुरली इको करती है... वहाँ जाते हुए एक ख़ूबसूरत इत्तेफ़ाक हुआ... रास्ते में एक जगह रुक के झील की कुछ फ़ोटो खींच रहे थे... सड़क से हल्की सी ढलान उतर के झील तक पहुँचा जा सकता था... उत्सुकता में भरे नीचे उतरे तो देखा झील किनारे किसी का बेहद सुन्दर कत्थई रंग का घोड़ा बंधा था... जो वहाँ के माहौल को और ज़्यादा पिक्चरिस्क बना रहा था... शांत ख़ूबसूरत झील.. किनारे बंधा घोड़ा... और सामने पहाड़ी पर ऊँचे ऊँचे हरे भरे पेड़... यहाँ आकर पल भर को किसी स्विस इलाके में होने का सा गुमां होता है... सच पूछिये तो ये एक ऐसी जगह थी जहाँ बिना किसी काम या किसी से बात किये पूरा दिन बिताया जा सकता था सिर्फ़ प्रकृति की ख़ूबसूरती में खोये हुए और ईश्वर की इस रचना को निहारते हुए... इको पॉइंट पहुँचे तो वहाँ आसपास थोड़ी बहुत दुकाने थी... जो अब धीरे धीरे खुल रही थीं और लोग अपनी दिनचर्या शुरू करने जा रहे थे... नीचे झील में बोटिंग भी हो रही थी.. पर ज़्यादातर लोग वहाँ की ख़ूबसूरती को आँखों और कैमरे में क़ैद करने में लगे थे... हमने भी कुछ देर रुक कर वही किया और फ़िर वापस चल दिये... 





हमारा अगला पड़ाव था रोज़ गार्डन... इस गार्डन को केरला फ़ॉरेस्ट डेवलपमेंट कारपोरेशन के सहयोग से मेन्टेन किया जाता है... मुन्नार इको-टूरिज़्म की कड़ी में एक बेहद ख़ूबसूरत सौगात जो यहाँ आने वाले टूरिस्टों को एक ही जगह पर रंग बिरंगे फूलों की असंख्य प्रजातियों को देखने का और लुत्फ़ उठाने का मौका देती है... कहने को रोज़ गार्डन पर शायद ही कोई ऐसा फूल हो जो यहाँ देखने को न मिला हो... और्किड्स से लेकर एन्थूरियम तक और इम्पेशंस से लेकर वाटर लिली तक... गुलाब की भरमार तो खैर थी ही... किस फूल को देखें और किसे नहीं... आपकी इसी दुविधा को दूर करने के लिए बड़ी ही कुशलता से फूलों के इस पार्क में वे रोड ही बनायी गयी है... पहाड़ की ढलान पर इस गार्डन को कुछ इस तरह से बनाया गया है की आप एक ओर से फूलों को देखते हुए नीचे उतरते जाते हैं और दूसरी ओर से फूलों को देखते हुए ही वापस चढ़ते जाते हैं... वापस आते तक फूल का शायद ही कोई ऐसा रंग हो जो आपने न देखा हो... आँखें रंगों से भर जाती हैं.. और दिल सुकून से...













अब इतनी ख़ूबसूरती देखने के बाद और कहीं जाने का मन तो नहीं था पर मुन्नार आयें और टी म्यूजियम न देखें ऐसा कैसे हो सकता है... हालाँकि पहले भी कई टी म्यूजियम देखे हैं उत्तराखंड में पर सोचा देखते हैं यहाँ क्या अलग है... कुछ ख़ास तो खैर नहीं था... चाय के इतिहास पर एक डॉक्युमेंट्री दिखायी जा रही थी.. पर उसका दूसरा बैच स्टार्ट होने में काफ़ी टाइम था... सो उसके लिए रुके नहीं... अन्दर दो कमरों में चाय बनाने की पुरानी मशीने रखी हुई थीं और कानन देवन की पहाड़ियों पर कब और कैसे चाय का प्लांटेशन लगाया गया और कैसे चाय का प्रोडक्शन शुरू हुआ ये पूरा इतिहास फ़ोटो समेत संजोया हुआ था वहाँ की दीवारों पे... फ़िर अन्दर एक बड़े से हॉल में चाय बनाने का पूरा प्रोसेस समझाया जा रहा था किस तरह पत्तियों का चुनाव होता है... फ़िर कैसे उन्हें सुखाया जाता है.. रोल किया जाता है... और कैसे ग्रेडिंग कर के हम तक पहुँचाया जाता है... ग्रीन टी और उसके फायदों के बारे में भी बताया गया... ग्रीन टी को बनाने और पीने का सही तरीका भी बताया गया... सबसे अनोखी बात जो पता चली वो ये की चाय का पेड़ कभी मरता नहीं... हर १०-१५ दिनों में नयी कोपलें आ जाती हैं और उन्हें तोड़ लिया जाता है... और पेड़ सालों साल चलता रहता है... 


टी म्यूज़ियम देख कर निकले तो दोपहर होने को आयी थी... हमें अब कोच्ची वापस लौटना था... मन को वहीं मुन्नार की पहाड़ियों पर छोड़ के... हम वापस चल तो दिये वहाँ से पर दिल में अजीब सी बेचैनी थी... जैसे कुछ अधूरा सा रह गया हो... एक दिन के इस छोटे से प्रवास ने जाने क्या जादू किया था कि दिल को ये यकीं हो चला था यहाँ ज़रूर वापस आना है एक दिन.. जल्द ही... फ़ुर्सत वाली एक लम्बी छुट्टी पर.. मुन्नार को और क़रीब से जानना बाक़ी है अभी...


Thursday, April 27, 2017

केरल डायरीज़ - ३ : मसालों की मादक गंध और चाय की चुस्कियों में डूबा वो शहर


वालर वॉटरफॉल

कोच्ची से क़रीब तीन घंटे के सफ़र के बाद पहाड़ी रास्ता शुरू होता है... जैसे जैसे हम ऊपर चढ़ते जाते हैं मौसम लुभावना होता जाता है... हवा में एक मादक सी गंध घुलती जाती है... हरियाली की... मसालों की... नारियल और केले के पेड़ों की जगह अब यहाँ पहाड़ पर उगने वाले तमाम जंगली पेड़ों ने ले ली है... रास्ते में यूँ तो बहुत से छोटे बड़े झरने हैं पर क्यूंकि पिछले साल बारिश काफ़ी कम हुई थी यहाँ और अभी गर्मी का मौसम था तो अधिकतर झरने सूखे हुए थे... सबसे पहले हमें वालर वॉटरफॉल देखने को मिला... पानी की कमी से वो भी अपने भव्य रूप में तो नहीं था फ़िर भी थोड़ा बहुत पानी था उसमें, जो दूर से देखने पर दूध की पतली पतली धाराओं जैसा लग रहा था.. थोड़ा आगे बढ़ने पर सात स्टेप्स में गिरने वाला विशाल सीढ़ीनुमा चीयाप्परा वॉटरफॉल मिला जो की पूरी तरह से सूखा हुआ था... पानी की एक बूँद नहीं थी उसमें... यूँ झरनों के आसपास अपनी आजीविका चलाने के लिए वहाँ के लोग तमाम छोटी-बड़ी खाने पीने की दुकाने खोल लेते हैं पर इस समय अधिकतर बंद थी... मॉनसून में शायद एक बार फ़िर रौनक हो यहाँ...

मुन्नार स्पाइस गार्डन









केरल अपने जिन मसालों की वजह से "स्पाइस कैपिटल ऑफ़ दा वर्ल्ड" कहलाता है वो सारे के सारे मसाले दरअसल यहाँ मुन्नार के आसपास ही उगते हैं और यहीं से कोचीन और वहाँ से पूरी दुनिया में भेजे जाते हैं... मुन्नार जाते समय आपको रास्ते में बहुत से स्पाइस गार्डन्स देखने को मिलते हैं... यहाँ आपको उन सारे मसालों और औषधियों के पेड़ देखने को मिल जाते हैं जो इन पहाड़ियों पर उगते हैं... ऐसे ही एक स्पाइस गार्डन देखने हम भी रुके... १०० रुपये प्रति व्यक्ति का एंट्री टिकट था जिसमें गाइड की फीस भी शामिल थी... ख़ास बात ये की आपको आपकी भाषा का ही गाइड दिया जाता है जो विस्तार से आपको एक एक पौधे और उसके औषधीय गुणों के बारे में बताता चलता है... 

इलायची
रोज़मर्रा के खाने में इस्तेमाल होने वाले तमाम मसाले जैसे हरी इलायची, काली मिर्च, तेजपत्र, लौंग, दालचीनी, जावित्री, जायफल आदि को पेड़ों पर लगे हुए देखना और उन्हें खा के या छू के महसूस करना एक अलग ही अनुभव था...बहुत कुछ नया जानने को मिला यहाँ... जैसे की दालचीनी और तेजपत्र एक ही पेड़ से मिलते हैं... दालचीनी या सिन्नमन पेड़ की छाल होती है और तेजपत्र उसी पेड़ के पत्ते.. इसी तरह जावित्री यानी की मेस और जायफल यानी की नटमेग भी एक ही पेड़ के फल से मिलता है... गोल हरा सा अमरुद के आकार का फल.. जिसे तोड़ने पर उसके अन्दर एक नट यानी की जायफल निकलता है.. ये नट नारंगी रंग के रेशों से ढका रहता है जिसे जावित्री कहते हैं... ठीक इसी तरह हरी इलायची यानी की कार्डमम के बारे में ये पता चला की वो पेड़ की ऐरिअल रूट्स पर निकलती है... और बहुत धीमी गति से बढती है... जितनी बड़ी इलायची हमें मार्केट में मिलती है उतना बड़ा होने में इलायची को तकरीबन ३ से ४ महीने का समय लग जाता है... 

जायफल









इन तमाम मसालों में साथ साथ हमने बहुत से मेडिसिनल प्लांट्स भी देखे... ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने से लेकर आर्थराइटिस के दर्द को दूर करने तक... हार्ट प्रॉब्लम से ले कर हेयर प्रॉब्लम तक हर चीज़ की दवा मौजूद थी इस गार्डन में.. और तो और यहाँ हमने कॉफ़ी और कोको यानी की चॉकलेट के पेड़ भी देखे.. बहुत ही अनूठा अनुभव था वो... अब चूँकि थोड़ा बहुत गार्डनिंग और पेड़ पौधों का शौक हमें भी है तो मन वहाँ जा कर मानो किसी छोटे बच्चे सा ख़ुश हो गया जिसे अपना प्रिय खिलौना मिल गया हो :) तकरीबन एक डेढ़ घंटे गार्डन में घूमने के बाद हमने वहाँ की शॉप से बहुत से मसाले वगैरा लिये और आगे चल पड़े...

कोको / चॉकलेट 
कॉफ़ी 
थोड़ा और आगे बढे तो एक ख़ूबसूरत से व्यू पॉइंट पे एक रेस्टोरेंट बना था... चारों तरफ़ हरी भरी पहाड़ियों से घिरा... थोड़ी देर वहाँ रुक कर थकान उतारी गयी... साथ में मसाला चाय पी गयी जो की वहाँ के पारम्परिक स्टील के छोटे से ग्लास और कटोरी में सर्व करी गयी थी... चाय की चुस्कियों के साथ ख़ूबसूरत वादियों के नज़ारे और ठंडी हवा ने एक नयी स्फूर्ति भर दी थी... आगे बढ़े तो सड़क के दोनों ओर चाय के हरे भरे बागान नज़र आने लगे... जिसका मतलब था कि अब हम मुन्नार के काफी करीब पहुँच चुके थे... अपने इन्हीं ख़ूबसूरत चाय के बागानों के लिए मुन्नार विश्वविख्यात है... इतने परफेक्टली ट्रिम्ड गोया किसी ने एक एक टुकड़ा तराश के सजाया हो वहाँ... सच में प्रकृति बड़ी ही दिलफ़रेब शय है...


मुन्नार पहुँचते तक ४ बज गए थे... थोड़ी देर होटल में रुक कर हम वहाँ का मार्केट घूमने निकल पड़े जो की पास ही था... छोटे से चौक के आसपास मानो एक पूरा कुनबा बसा था छोटी बड़ी दुकानों और रेस्टोरेंट्स का... सड़क के किनारे बहुत से फूलवाले डलिया में रख कर जैस्मिन और क्रॉसैन्ड्रा के फूलों की वेणियाँ बेच रहे थे... सामने एक बड़ा सा सब्ज़ी और फलों का मार्केट था...  कॉफ़ी शॉप से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान सब एक ही जगह उपलब्ध.. एक मज़ेदार बात ये की वहाँ चॉकलेट किलो के भाव बिक रही थी हर दूसरी दूकान में... दरअसल मुन्नार में होममेड चॉकलेट बहुतयात में मिलती है जिसे यहाँ आने वाले टूरिस्ट सुवनिअर के तौर पर ले जाते हैं... हाँ खाने में बेहद स्वादिष्ट होती है और बहुत सी वेरायटीज़ में मिलती है... साथ ही वहाँ होममेड सोप भी बहुत मिल रहा था जिसे लोग सुवनिअर की तरह ख़रीद रहे थे... बड़ी सारी मनमोहक खुश्बुओं में... हमें सबसे ज़्यादा उसकी पैकिंग ने अट्रैक्ट किया... उसके कवर सुपारी के पत्तों से बनाये गए थे...  मार्केट घूम कर डिनर करते हुए वापस आये तो मौसम बेहद ठंडा हो गया था... थकन आँखों पर तारी थी पर मन उर्जा से भरा हुआ... 

आज का दिन बहुत कुछ नया एक्स्प्लोर करने का मौका दे कर गया... और यहाँ की मीठी चॉकलेट्स की तरह दिल में ढेरों मीठी यादों को संजो गया हमेशा के लिये... मुन्नार की फ़िज़ाओं में एक अजब सा नशा है... एक पवित्रता भी है... दिव्यता भी... शान्ति भी और सुकून भी... और यदि आप भी हमारी ही तरह प्रकृति प्रेमी हैं तो मुन्नार आ कर आप भी पहली नज़र के प्यार वाली थ्योरी पर भरोसा करने लगेंगे...!



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Thursday, April 20, 2017

केरल डायरीज़ - ३ : प्रकृति की गोद में परीकथा से घर... कोच्चि से मुन्नार



३० जनवरी २०१७ 

कहने को केरल में आये दो दिन हो चुके थे... अब तक हम कोच्ची से भी मिल चुके थे और अथिरापल्ली के भीमकाय झरनों से भी... फ़िर भी जाने क्या था की मन को अब तक सुकून नहीं था... या यूँ कहें की यात्रा में होने का एहसास नहीं था.. अब आप सोच रहे होंगे की वो कैसा होता है...  इसे हमारे नज़रिये से कुछ ऐसे समझिये कि जब हम यात्रा में होते हैं तो पूरी तरह ख़ुद को प्रकृति के हवाले कर देते हैं... और अपने आसपास के वातावरण में ख़ुद को खो देते हैं... या यूँ कहिये की सब कुछ जज़्ब करते चलते हैं... यात्रा के दौरान ज़्यादा बातचीत करना भी हमे पसंद नहीं... बस हम, हमारा कैमरा, प्रकृति और दिमाग़ में ढेर सारा कौतुहल... यहाँ के लोग कैसे हैं.. यहाँ का खाना पीना, रहन सहन कैसा है... पेड़ पौधे, खेत खलिहान, पक्षी जानवर, से लेकर मिट्टी का रंग, हवा की ख़ुश्बू और पानी की मिठास तलक... सब कुछ... दिमाग किसी अलग ही स्टेट में होता है यात्रा के दौरान.. ट्रैवलिंग हमारे लिये मैडिटेशन की तरह है... जो अब तक मिसिंग लग रहा था हमें.. 

तो एक बार फ़िर मन में ढेर सारे कौतुहल के संग केरल यात्रा का तीसरा दिन शुरू किया... आज बारी थी मुन्नार की... इस ट्रिप के हमारे सबसे प्रिय डेस्टिनेशन की... कोच्ची शहर से बाहर निकलते निकलते यही कोई आधे घंटे के भीतर ही केरल का एक अलग ही रूप देखने को मिला... केरल की वो हरियाली जिसके बारे में अब तक सिर्फ़ किताबों और तस्वीरों में देखा-सुना था वो बाहें फैलाये हमसे गले मिलने को बेताब खड़ी थी राहों में... जहाँ तक नज़र जाये सड़क के दोनों ओर केले और नारियल के अनगिनत पेड़ एक अनूठी छटा बिखेर रहे थे... केरल का हरा सोना... और उस सब के बीच छोटे-बड़े ख़ूबसूरत चटक रंगों से रौशन घर यूँ खड़े थे गोया कोई परीकथा आपकी आँखों के सामने साँस ले रही हो... घरों का वास्तु विन्यास या आर्किटेक्चर ऐसा की पहली नज़र में आपको सम्मोहित कर ले और अपने प्यार में पड़ने को मजबूर कर दे... केरल की सौम्यता से लबरेज़... पहली चीज़ जो आप केरल और उसके आर्किटेक्चर के बारे में कह सकते है वो है डाउन टू अर्थ - मिट्टी से जुड़ा हुआ.. फ़िर भले वो कोई आलीशान बंगला हो या छोटा सा एक कमरे का घर जो आपकी पहुँच से बस दो सीढ़ी भर दूर हो... 

ज़रा इमैजिन कर के देखिये.. अपने शहर में कोई चटक नीला, गहरा गुलाबी या फ़िर हरा या फालसी रंग का घर सोच भी सकते हैं क्या आप ? कैसा बेतुका सा लगेगा... अभी तक हमने तो कम से कम हिन्दुस्तान के किसी और शहर में ऐसे रंग के घर नहीं देखे कभी... सोच के ही कैसा वीयर्ड सा लगता है... पर यहाँ देखिये हर उस वीयर्ड कलर का घर कितना ख़ूबसूरती से खड़ा है नारियल और केले के पेड़ों के बीच... एक बार कभी ऐसे ही किसी घर के रह कर वहाँ के कल्चर को समझने की भी ख्वाहिश है मन में... कितना सुकून भरा होगा न ऐसे शान्त, पौल्यूशन फ्री एनवायरनमेंट में रहना... केरल ऐसे ही तो नहीं हिन्दुस्तान का सबसे साफ़ सुथरा प्रदेश कहलाता है... 

यहाँ से गुज़रते हुए एक और बात जो आकर्षित करती है वो ये की बड़े बड़े शहरों की तरह यहाँ छोटी-बड़ी कॉलोनी, पॉश एरिया, गाँव-शहर जैसी बाउन्ड्रीज़ नहीं हैं... एक बड़े आलीशान बंगले के ठीक बगल में एक छोटा सा एक कमरे का घर भी हो सकता है या एक छोटी सी दुकान भी... कहीं कोई डिमार्केशन नहीं कि ये अमीर लोगों का एरिया है और ये कम अमीर लोगों का... कितना ख़ूबसूरत है न ये तारतम्य... बिलकुल प्रकृति की तरह जो कभी कोई भेदभाव नहीं करती किसी के बीच... शायद प्रकृति के इतने क़रीब रह के यहाँ के लोग भी उस जैसे ही हो गए हैं...

जारी...



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